गुजरात उच्च न्यायालय
स्पेशल सिविल एप्लीकेशन संख्या 11151, वर्ष 2026 (C/SCA/11151/2026)।
13 अगस्त, 2026।
न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत।
मूल वादी (याचिकाकर्ता) बनाम मूल प्रतिवादी (प्रतिवादीगण)
"अस्वीकरण: यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किए गए अदालत के फैसले का एक सरलीकृत सारांश है। यह कानूनी सलाह या आधिकारिक कानूनी दस्तावेज नहीं है। पूर्ण तथ्यों और संपूर्ण संदर्भ के लिए, कृपया नीचे संलग्न आधिकारिक निर्णय देखें।"
- मामला किस बारे में था: याचिकाकर्ता (मूल वादी) ने विंचिया के प्रधान सिविल जज की अदालत में एक सिविल मुकदमा दायर किया, जिसमें प्रतिवादियों को उनकी जमीन के कब्जे में बाधा डालने या वाद संपत्ति में प्रवेश करने से रोकने के लिए कानूनी घोषणा की मांग की गई। वादी का साक्ष्य चरण 17 सितंबर, 2025 को बंद होने के बाद, और प्रतिवादी की जिरह (क्रॉस-एक्जामिनेशन) के दौरान, वादी ने एक आवेदन (Exhibit 84) दायर किया जिसमें ट्रायल कोर्ट से अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने के अपने अधिकार को फिर से खोलने के लिए कहा गया।
- मुख्य तर्क: वादी ने तर्क दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 151 के तहत, ट्रायल कोर्ट को उसे लंबे समय से चले आ रहे कब्जे को प्रदर्शित करने के लिए लैंड ग्रैबिंग एक्ट के तहत राजकोट के कलेक्टर के समक्ष अपने बेटे के खिलाफ दायर एक शिकायत की प्रति रिकॉर्ड पर लाने का एक अवसर देना चाहिए। उसने आगे तर्क दिया कि आवेदन की अनुमति देने से प्रतिवादी को कोई पूर्वाग्रह (नुकसान) नहीं होगा। उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड का मूल्यांकन किया और नोट किया कि 26 मई, 2025 का कलेक्टर का आदेश वादी के साक्ष्य चरण के बंद होने से पहले ही उसकी अच्छी तरह से जानकारी में था, जिसका अर्थ है कि उसके पास आधिकारिक गवाहों को बुलाने का पर्याप्त पूर्व अवसर था।
- अदालत ने क्या निर्णय लिया: गुजरात उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया, साक्ष्य को फिर से खोलने के आवेदन को खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा [1, 3.1, 20]। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुकदमों (के.के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी और मेसर्स बगाई कंस्ट्रक्शन बनाम मेसर्स गुप्ता बिल्डिंग मटेरियल स्टोर) का हवाला देते हुए, अदालत ने माना कि धारा 151 सीपीसी के तहत निहित शक्तियों का उपयोग किसी पार्टी की अपनी लापरवाही को छिपाने, साक्ष्य में कमियों को भरने या अदालत की कार्यवाही को लंबा खींचने के लिए नियमित रूप से नहीं किया जा सकता है। अदालत ने पुष्टि की कि जब कोई स्वतंत्र औचित्य मौजूद न हो, तो विरोधी पक्ष को नुकसान न होना साक्ष्य को फिर से खोलने का एक वैध आधार नहीं है।
यह निर्णय आम नागरिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सिविल मुकदमे के दौरान समय पर सभी प्रासंगिक दस्तावेजों और गवाहों की गवाही प्रस्तुत करने के महत्व को उजागर करता है। यह आम जनता के लिए स्पष्ट करता है कि एक बार किसी पक्ष का साक्ष्य चरण आधिकारिक रूप से बंद हो जाने के बाद, अदालतें केवल पहले की चूकों या लापरवाही को ठीक करने के लिए मुकदमों में देरी करने या साक्ष्य को फिर से खोलने की अनुमति नहीं देंगी। कड़े प्रक्रियात्मक अनुशासन को लागू करके, यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि भूमि और सिविल विवादों का कुशलतापूर्वक समाधान किया जाए, बिना किसी भी पक्ष को कृत्रिम रूप से मुकदमेबाजी को लंबा खींचने की अनुमति दिए।
लागू कानून और धाराएं
- लागू अधिनियम: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC); गुजरात भू-कब्जा निषेध अधिनियम / लैंड ग्रैबिंग एक्ट (तथ्यों में संदर्भित)।
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 151: न्याय के लिए आवश्यक आदेश जारी करने के सिविल अदालतों की अंतर्निहित शक्तियों को सुरक्षित रखती है, लेकिन किसी पक्ष की लापरवाही के कारण आई कमियों को भरने के लिए इसका नियमित रूप से उपयोग नहीं किया जा सकता है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XVIII नियम 17: गवाहों को वापस बुलाने या अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति देने के अदालत के विवेक को नियंत्रित करता है, जिसके लिए केवल नुकसान न होने के बजाय स्वतंत्र कानूनी औचित्य की आवश्यकता होती है।
मुख्य धाराएं: